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गोवर्धन पर्वत की पूजा लेखनी प्रतियोगिता -13-Nov-2023

               गोवर्धन  पर्वत  की पूजा


            गोवर्धन  पर्वत भगवान श्री कृष्ण की लीलास्थली है। यहाँ पर भगवान  श्रीकृष्ण  अपनी गाय चराते थे। यहीं पर वह अपने  सखाऔ के साथ  खेलते थे। यहीं पर भगवान श्री कृष्ण ने द्वापर युग में ब्रजवासियों को इन्द्र के प्रकोप से बचाने के लिये गोवर्धन पर्वत अपनी कनिष्ठ अंगुली पर उठाया था। गोवर्धन पर्वत को भक्तजन गिरिराज जी भी कहते हैं।

   गोकुल के निवासी अच्छी वर्षा के लिए  इन्द्र  की पूजा करते थे। श्रीकृष्ण  ने इस पूजा की जगह  गोवर्धन  पर्वत  की पूजा का प्रस्ताव  रखा जिसे सभी लोग मान गये।

     जब इन्द्र  को इसकी सूचना मिली कि गोकुल के निवासी मेरी पूजा बन्द करके गोवर्धन  पर्वत  की पूजा करना चाह रहे हैं तब इन्द्र  ने क्रोधित  होकर  वहाँ इतना पानी बरसाया कि वहाँ तबाही होने लगी। तब श्रीकृष्ण  ने गोवर्धन  पर्वत  उठाकर  उनकी रक्षा की। उसी समय  से गोवर्धन  पूजा की जाती  है। सदियों से यहां दूर-दूर से भक्तजन गिरिराज जी की परिक्रमा करने आते रहे हैं। यह 7 कोस की परिक्रमा लगभग 21 किलोमीटर की है। मार्ग में पड़ने वाले प्रमुख स्थल आन्यौर, गोविन्द कुंड, पूंछरी का लौठा,जतिपुरा राधाकुंड, कुसुम सरोवर, मानसी गंगा, दानघाटी इत्यादि हैं।

परिक्रमा जहां से शुरू होती है वहीं पर एक प्रसिद्ध मंदिर भी है जिसे दानघाटी मंदिर कहा जाता है।राधाकुण्ड से तीन मील दूर गोवर्द्धन पर्वत है। पहले यह गिरिराज 7 कोस (२१ कि·मी) में फैले हुए थे, पर अब आप धरती में समा गए हैं। यहीं कुसुम सरोवर है, जो बहुत सुंदर बना हुआ है।

यहां वज्रनाभ के पधराए हरिदेवजी थे पर औरंगजेबी काल में वह यहां से चले गए। पीछे से उनके स्थान पर दूसरी मूर्ति प्रतिष्ठित की गई।

यह मंदिर बहुत सुंदर है। यहां श्री वज्रनाभ के ही पधराए हुए एकचक्रेश्वर महादेव का मंदिर है। गिरिराज के ऊपर और आसपास गोवर्द्धन ग्राम बसा है तथा एक मनसादेवी का मंदिर है। मानसीगंगा पर गिरिराज का मुखारविन्द है, जहां उनका पूजन होता है तथा आषाढ़ी पूर्णिमा तथा कार्तिक की अमावस्या को मेला लगता है।

गोवर्द्धन में सुरभि गाय, ऐरावत हाथी तथा एक शिला पर भगवान्‌ का चरणचिह्न है। मानसी गंगा पर जिसे भगवान ने अपने मन से उत्पन्न किया था, दीवाली के दिन जो दीपमालिका होती है, उसमें मनों घी खर्च किया जाता है, शोभा दर्शनीय होती है। यहां लोग दण्डौती परिक्रमा करते हैं। दण्डौती परिक्रमा इस प्रकार की जाती है कि आगे हाथ फैलाकर जमीन पर लेट जाते हैं और जहाँ तक हाथ फैलते हैं, वहाँ तक लकीर खींचकर फिर उसके आगे लेटते हैं।

इसी प्रकार लेटते-लेटते या साष्टांग दण्डवत्‌ करते-करते परिक्रमा करते हैं जो एक सप्ताह से लेकर दो सप्ताह में पूरी हो पाती है।

               यहाँ गोरोचन, धर्मरोचन, पापमोचन और ऋणमोचन- ये चार कुण्ड हैं तथा भरतपुर नरेश की बनवाई हुई छतिरयां तथा अन्य सुंदर इमारतें हैं। मथुरा से दीघ को जाने वाली सड़क गोवर्द्धन पार करके जहाँ पर निकलती है स्थान दानघाटी कहलाता है। यहाँ भगवान्‌ दान लिया करते थे। यहाँ दानरायजी का मंदिर है। इसी गोवर्द्धन के पास 20 कोस के बीच में सारस्वतकल्प में वृंदावन था तथा इसी के आसपास यमुना बहती  है।

      आज  भी भक्तजन  गोवर्धन  पर्वत  की परिक्रमा  करके अपने  जीवन  को धन्य करके पुण्य  कमाते हैं।

आज की दैनिक प्रतियोगिता  हेतु  रचना।
नरेश शर्मा  " पचौरी "

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2 Comments

Gunjan Kamal

13-Nov-2023 09:15 PM

👌👏

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Reena yadav

13-Nov-2023 03:20 PM

👍👍

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